सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार से पूछा है कि चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को क्यों हटाया गया। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता केवल वास्तविक रूप से ही नहीं, बल्कि जनता को दिखाई भी देनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा? मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कई अहम सवाल किए। अदालत ने पूछा कि जब पहले दिए गए फैसले में चयन समिति में CJI को शामिल करने की बात कही गई थी, तो बाद में संसद द्वारा बनाए गए कानून में उन्हें बाहर रखने का आधार क्या था। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि चुनाव आयोग लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। इसलिए उसकी नियुक्ति प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिस पर किसी तरह का संदेह न हो। अदालत ने यह भी कहा कि केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष दिखाई भी देनी चाहिए ताकि जनता का भरोसा बना रहे। वर्तमान कानून के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति बनाई गई है। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं। इस समिति में मुख्य न्यायाधीश को स्थान नहीं दिया गया है। केंद्र सरकार ने क्या दलील दी? केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि केवल इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि प्रधानमंत्री या सरकार बहुमत का दुरुपयोग करेगी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के पद की अपनी संवैधानिक गरिमा और विश्वसनीयता है तथा उनके निर्णयों पर बिना आधार संदेह नहीं किया जाना चाहिए। केंद्र ने यह भी कहा कि संविधान कहीं भी यह अनिवार्य नहीं करता कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति में न्यायपालिका का सदस्य होना ही चाहिए। सरकार के अनुसार यह संसद का नीतिगत फैसला है कि चयन समिति की संरचना कैसी हो। इसलिए CJI को शामिल करना कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं बल्कि एक विधायी विकल्प हो सकता है। CJI को लेकर विवाद क्यों है? यह पूरा विवाद 2023 के उस कानून से जुड़ा है जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की नई प्रक्रिया लागू की गई। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि जब तक संसद नया कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल रहेंगे। बाद में संसद ने नया कानून पारित किया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया गया। इसके बाद कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गईं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे चयन समिति में सरकार के दो सदस्य हो जाते हैं, जिससे कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठ सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि अदालत यह नहीं मान रही कि सरकार गलत इरादे से काम करेगी, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और संतुलित दिखनी चाहिए। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता क्यों महत्वपूर्ण है? भारत का चुनाव आयोग लोकसभा, राज्य विधानसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना इसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें, तो चुनाव प्रणाली पर जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि अदालत इस मामले में केवल कानूनी पहलू ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी महत्वपूर्ण मान रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता देश के लोकतंत्र की मजबूती का आधार है। इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें सरकार, विपक्ष और यदि आवश्यक हो तो किसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की भी भूमिका दिखाई दे। दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि संसद द्वारा बनाया गया कानून पूरी तरह संवैधानिक है और केवल CJI को शामिल न करने से संस्था की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती। आगे क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की दलीलें सुनी हैं और इस मुद्दे पर विस्तार से विचार कर रहा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह संकेत दिया कि चुनाव आयोग जैसी संस्था के लिए चयन प्रक्रिया में निष्पक्षता का स्पष्ट संदेश जाना भी उतना ही जरूरी है जितनी वास्तविक निष्पक्षता। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर है। यदि अदालत वर्तमान कानून को सही मानती है तो मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी। वहीं यदि अदालत को लगे कि चयन प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत है, तो केंद्र सरकार को नई व्यवस्था पर विचार करना पड़ सकता है। फिलहाल यह मामला भारतीय लोकतंत्र, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा बना हुआ है।