यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद पाकिस्तान ने सऊदी की सुरक्षा को अपनी "रेड लाइन" बताया है। हालांकि पाकिस्तान ने अभी ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल होने की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन उसने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि सऊदी अरब पर बड़ा हमला होता है और सैन्य मदद मांगी जाती है तो वह अपने रक्षा समझौते के तहत कदम उठा सकता है। हूती हमले के बाद बढ़ा पश्चिम एशिया का तनाव पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के कई ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए। रिपोर्टों के अनुसार, इन हमलों के बाद सऊदी अरब ने भी जवाबी कार्रवाई की, जिससे क्षेत्र में वर्षों से चला आ रहा अपेक्षाकृत शांत माहौल टूटता नजर आ रहा है। पाकिस्तान ने क्यों कहा- यह हमारी 'रेड लाइन' है? हूती हमलों के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने साफ कहा कि सऊदी अरब की सुरक्षा पाकिस्तान के लिए "रेड लाइन" है। पाकिस्तान का कहना है कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग का समझौता है और यदि सऊदी अरब अपनी सुरक्षा के लिए सहायता मांगता है, तो इस्लामाबाद अपने दायित्वों पर विचार करेगा। हालांकि पाकिस्तान ने यह भी दोहराया है कि उसकी पहली प्राथमिकता क्षेत्र में तनाव कम कराना और कूटनीतिक समाधान निकालना है। क्या पाकिस्तान सीधे ईरान के खिलाफ युद्ध में उतरेगा? फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है कि पाकिस्तान ईरान के खिलाफ सीधे युद्ध में शामिल होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान बेहद संतुलित नीति अपनाने की कोशिश कर रहा है क्योंकि उसके दोनों देशों—ईरान और सऊदी अरब—के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। एक ओर सऊदी अरब उसका प्रमुख रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ उसकी लंबी सीमा और सुरक्षा संबंधी हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस्लामाबाद खुली सैन्य टकराव से बचना चाहता है, लेकिन सऊदी की सुरक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता भी बनाए रखना चाहता है। हूती हमलों से क्यों बढ़ी चिंता? हूती विद्रोहियों ने चेतावनी दी है कि यदि सऊदी अरब ने सैन्य कार्रवाई बढ़ाई तो उसके हवाई अड्डों, बंदरगाहों और तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जाएगा। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार और लाल सागर के समुद्री व्यापार मार्गों पर भी असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह संघर्ष और फैलता है तो पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ सकती है, जिसका असर तेल की कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। पाकिस्तान के सामने क्या हैं चुनौतियां? पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने दोनों अहम साझेदार देशों के बीच संतुलन बनाए रखना है। यदि संघर्ष और गहराता है तथा सऊदी अरब औपचारिक रूप से सैन्य सहायता मांगता है, तो इस्लामाबाद पर कठिन फैसला लेने का दबाव बढ़ सकता है। साथ ही पाकिस्तान लगातार मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश भी कर रहा है ताकि क्षेत्रीय तनाव को कूटनीतिक बातचीत के जरिए कम किया जा सके। आगे क्या? फिलहाल पाकिस्तान ने युद्ध में शामिल होने की घोषणा नहीं की है। लेकिन सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर उसका सख्त रुख यह संकेत देता है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो इस्लामाबाद को अपने रक्षा समझौतों और क्षेत्रीय हितों के बीच संतुलन बनाते हुए बड़ा फैसला लेना पड़ सकता है। आने वाले दिनों में सऊदी अरब, ईरान और हूती विद्रोहियों की गतिविधियां इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेंगी।