करीब छह साल पहले गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद अब पहली बार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आने वाले हैं। उनका यह दौरा दोनों देशों के रिश्तों में आई कड़वाहट के बाद एक बड़े कूटनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है और नई दिल्ली तथा बीजिंग दोनों में इसकी तैयारियां तेज हो गई हैं। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में होगी शी जिनपिंग की भारत यात्रा जानकारी के अनुसार, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सितंबर 2026 में नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आएंगे। वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुई सैन्य झड़प के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी। इससे पहले उन्होंने भारत का दौरा 2019 में किया था। यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत और चीन के संबंध सीमा विवाद, सैन्य तनाव और कूटनीतिक मतभेदों के कारण चुनौतीपूर्ण रहे हैं। अब दोनों देशों के शीर्ष नेताओं का एक मंच पर मिलना भविष्य की दिशा तय करने वाला कदम माना जा रहा है। गलवान के बाद कैसे बदले भारत-चीन संबंध? 15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इस घटना में दोनों पक्षों को नुकसान हुआ और इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में गंभीर तनाव पैदा हो गया। गलवान की घटना के बाद भारत ने चीन के खिलाफ कई आर्थिक और तकनीकी कदम उठाए। कई चीनी मोबाइल ऐप पर प्रतिबंध लगाया गया, निवेश नियमों को सख्त किया गया और सीमा पर सैन्य तैनाती भी बढ़ाई गई। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताएं भी हुईं ताकि सीमा पर तनाव कम किया जा सके। पिछले कुछ समय में दोनों पक्षों ने सीमा पर कुछ क्षेत्रों में तनाव कम करने के लिए बातचीत जारी रखी है। हालांकि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से जुड़े कई मुद्दे अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। ऐसे में शी जिनपिंग की भारत यात्रा को दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने का अवसर माना जा रहा है। किन मुद्दों पर हो सकती है चर्चा? विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के दौरान कई अहम विषयों पर चर्चा हो सकती है। इनमें सीमा पर शांति बनाए रखना, दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल करना, व्यापारिक संबंधों को बेहतर बनाना और क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर सहयोग शामिल हो सकता है। भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता दोनों देशों के संबंधों की बुनियाद है। वहीं चीन भी हाल के महीनों में संवाद के जरिए मतभेद कम करने की बात करता रहा है। ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान अन्य सदस्य देशों के नेताओं के साथ भी कई द्विपक्षीय बैठकें होने की संभावना है। ऐसे में भारत और चीन की बैठक पर दुनिया की नजर रहेगी क्योंकि दोनों एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं और वैश्विक राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। नई दिल्ली और बीजिंग में बढ़ी कूटनीतिक गतिविधियां शी जिनपिंग की प्रस्तावित यात्रा को लेकर दोनों देशों के अधिकारियों के बीच तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। सुरक्षा व्यवस्था, सम्मेलन की रूपरेखा और संभावित द्विपक्षीय बैठकों को लेकर लगातार संपर्क बनाए रखा जा रहा है। कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि यह यात्रा सकारात्मक माहौल में संपन्न होती है तो इससे दोनों देशों के बीच संवाद को नई गति मिल सकती है। हालांकि सीमा विवाद जैसे जटिल मुद्दों का समाधान एक बैठक में संभव नहीं माना जा रहा, लेकिन शीर्ष स्तर की बातचीत भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंध अभी भी काफी बड़े हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार जारी है, लेकिन सीमा विवाद के कारण राजनीतिक विश्वास पहले जैसा नहीं बन पाया है। ऐसे में इस यात्रा का सबसे बड़ा उद्देश्य विश्वास बहाली की दिशा में आगे बढ़ना हो सकता है। क्यों अहम है यह दौरा? शी जिनपिंग की यह यात्रा केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने तक सीमित नहीं मानी जा रही है। यह ऐसे समय में हो रही है जब भारत और चीन दोनों वैश्विक मंचों पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहे हैं और दुनिया की नजर एशिया की रणनीतिक स्थिति पर बनी हुई है। यदि इस दौरान दोनों देशों के बीच सकारात्मक बातचीत होती है तो सीमा पर स्थिरता, आर्थिक सहयोग और बहुपक्षीय मंचों पर समन्वय को बढ़ावा मिल सकता है। वहीं यदि किसी बड़े मुद्दे पर सहमति नहीं बनती, तब भी शीर्ष नेताओं के बीच सीधा संवाद भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाएगा। गलवान संघर्ष के बाद पैदा हुए अविश्वास के माहौल में यह पहली उच्चस्तरीय यात्रा दोनों देशों के रिश्तों में नई शुरुआत का संकेत दे सकती है। हालांकि वास्तविक प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि सीमा विवाद और अन्य लंबित मुद्दों पर आगे कितनी ठोस पहल होती है। फिलहाल नई दिल्ली और बीजिंग दोनों इस यात्रा को बेहद महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर के रूप में देख रहे हैं।